विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग और वर्तमान भारत
भारत स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, जहाँ संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का आश्वासन देता है। किंतु इस आदर्श और यथार्थ के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी है—विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की। यह वर्ग कानून की किताबों में भले न लिखा हो, पर सामाजिक व्यवहार, आर्थिक अवसरों और सत्ता-संरचनाओं में उसकी उपस्थिति स्पष्ट दिखाई देती है। वर्तमान भारत को समझने के लिए इस विशेषाधिकार की प्रकृति, उसके प्रभाव और उससे उपजे विरोधाभासों को समझना अनिवार्य है।
विशेषाधिकार का अर्थ केवल धन या सत्ता तक सीमित नहीं है। यह जन्म से मिलने वाला वह सामाजिक लाभ है, जो किसी व्यक्ति को बिना संघर्ष के अवसरों के निकट पहुँचा देता है। भारत जैसे ऐतिहासिक रूप से असमान समाज में जाति, वर्ग, लिंग, भाषा और क्षेत्र—सभी विशेषाधिकार के निर्धारक रहे हैं। उच्च जाति में जन्म, शहरी परिवेश, अंग्रेज़ी शिक्षा और संपन्न परिवार—ये सभी ऐसे अदृश्य पूंजी हैं, जो व्यक्ति को प्रतिस्पर्धा में पहले ही आगे खड़ा कर देती हैं। इसके विपरीत, वंचित वर्ग अपनी ऊर्जा अवसर खोजने में नहीं, बल्कि बाधाओं को पार करने में खर्च करता है।
वर्तमान भारत में आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण ने विशेषाधिकार को नए आयाम दिए हैं। निजी शिक्षा, कोचिंग संस्थान, विदेशी विश्वविद्यालय और कॉरपोरेट नेटवर्क—ये सब अवसर केवल उन्हीं तक सीमित हैं, जिनके पास पहले से संसाधन हैं। इस प्रक्रिया में योग्यता की अवधारणा भी विकृत होती जा रही है, जहाँ ‘मेरिट’ को अक्सर सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग करके देखा जाता है। यह भूल जाना आसान है कि समान परीक्षा देने वाले दो छात्रों के पीछे खड़े सामाजिक संसाधन समान नहीं होते।
डिजिटल भारत के दौर में विशेषाधिकार ने तकनीकी रूप धारण कर लिया है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल साक्षरता आज नए सामाजिक विभाजक बन गए हैं। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल सेवाएँ और AI आधारित अवसर उन लोगों के लिए वरदान हैं, जो पहले से सशक्त हैं, जबकि वंचित वर्ग के लिए यह खाई और गहरी हो जाती है। इस प्रकार तकनीक, जो समानता का साधन हो सकती थी, कई बार असमानता को और मजबूत करती दिखाई देती है।
राजनीति और शासन में भी विशेषाधिकार की भूमिका कम नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक का मत समान होता है, पर प्रभाव समान नहीं। राजनीतिक परिवारों, पूंजी-संपन्न वर्ग और सत्ता के निकट खड़े लोगों को नीति निर्माण में स्वाभाविक बढ़त मिलती है। मीडिया और सार्वजनिक विमर्श पर भी उन्हीं की आवाज़ अधिक सुनाई देती है, जिनके पास संसाधन और मंच हैं। परिणामस्वरूप हाशिए के समुदायों की समस्याएँ अक्सर ‘मुख्य मुद्दों’ की सूची में नीचे खिसक जाती हैं।
इन परिस्थितियों में आरक्षण और सकारात्मक भेदभाव की नीतियाँ विशेषाधिकार को संतुलित करने का प्रयास हैं। परंतु इन्हें अक्सर विशेषाधिकार का नया रूप बताकर आलोचना की जाती है। यह बहस तब अधूरी रह जाती है जब हम यह नहीं समझते कि ये नीतियाँ असमान प्रारंभिक स्थितियों को बराबर करने का प्रयास हैं, न कि किसी को अनुचित लाभ देने का। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि किसे कितना मिला, बल्कि यह है कि क्या सभी को दौड़ की शुरुआत एक ही रेखा से करने का अवसर मिला।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत हमें सिखाता है कि असमानता तभी नैतिक है जब वह सबसे कमजोर के हित में हो। महात्मा गांधी का ‘अंत्योदय’ और अमर्त्य सेन का ‘क्षमता दृष्टिकोण’ भी इसी ओर संकेत करता है कि समाज की प्रगति का माप सबसे सशक्त नहीं, बल्कि सबसे कमजोर व्यक्ति से होना चाहिए। यदि विशेषाधिकार समाज के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को बेहतर नहीं बनाता, तो वह विकास नहीं, बल्कि केवल संकेंद्रण है।
आगे की राह केवल नीतिगत सुधारों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी होकर गुजरती है। गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, डिजिटल समावेशन और पारदर्शी शासन—ये सभी विशेषाधिकार की जड़ों को कमजोर कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है विशेषाधिकार की स्वीकारोक्ति। जब तक समाज का सशक्त वर्ग यह नहीं मानेगा कि उसकी सफलता में केवल परिश्रम ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक लाभ भी शामिल हैं, तब तक समानता एक दूर का स्वप्न बनी रहेगी।
निष्कर्षतः, वर्तमान भारत में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग लोकतंत्र के भीतर मौजूद एक मौन शक्ति है, जो अवसरों की दिशा तय करती है। समानता का संघर्ष किसी एक वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था के खिलाफ है, जो जन्म को भविष्य से जोड़ देती है। एक सच्चा लोकतंत्र वही है, जहाँ विशेषाधिकार विरासत न बने, और हर नागरिक को गरिमा के साथ आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले।
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