Skip to main content

Posts

Showing posts with the label 12 Political Science Notes

12th Political Science Complete Notes

  📘 Part A: Contemporary World Politics (समकालीन विश्व राजनीति) The Cold War Era (शीत युद्ध का दौर) The End of Bipolarity (द्विध्रुवीयता का अंत) US Hegemony in World Politics ( विश्व राजनीति में अमेरिकी वर्चस्व ) Alternative Centres of Power ( शक्ति के वैकल्पिक केंद्र ) Contemporary South Asia ( समकालीन दक्षिण एशिया ) International Organizations ( अंतर्राष्ट्रीय संगठन ) Security in the Contemporary World ( समकालीन विश्व में सुरक्षा ) Environment and Natural Resources ( पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन ) Globalisation ( वैश्वीकरण ) 📘 Part B: Politics in India Since Independence (स्वतंत्रता के बाद भारत में राजनीति) Challenges of Nation-Building (राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ) Era of One-Party Dominance (एक-दलीय प्रभुत्व का युग) Politics of Planned Development (नियोजित विकास की राजनीति) India’s External Relations (भारत के विदेश संबंध) Challenges to and Restoration of the Congress System ( कांग्रेस प्रणाली की चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना ) The Crisis of Democratic...

12th Political Science Notes : Congress Pranali Chunautiyan Aur Punrsthapna

✦ कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियां और पुनर्स्थापना प्रस्तावना भारत की स्वतंत्रता के बाद पहले दो दशकों तक कांग्रेस पार्टी न केवल सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल थी, बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था का आधार भी बन गई थी। इस दौर को ही “कांग्रेस प्रणाली” कहा जाता है। नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने राष्ट्र-निर्माण, लोकतंत्र की स्थिरता और विकास की रूपरेखा तय की। किंतु 1960 के दशक में यह प्रणाली गंभीर चुनौतियों से गुज़री। यह दशक भारतीय लोकतंत्र के लिए “खतरनाक युग” (Dangerous Decade) कहा गया क्योंकि इस दौरान राजनीतिक उत्तराधिकार, खाद्यान्न संकट, युद्ध, महंगाई और कांग्रेस संगठन के भीतर शक्ति संघर्ष जैसे प्रश्न खड़े हुए। I. नेहरू के बाद राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती 1. “खतरनाक युग” – 1960 का दशक नेहरू (1964) और शास्त्री (1966) की मृत्यु ने सत्ता के उत्तराधिकार को अस्थिर बना दिया। विदेशी पर्यवेक्षकों ने आशंका जताई कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था टूट सकती है और सेना सत्ता पर कब्जा कर सकती है। किंतु भारत ने लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण की मिसाल पेश की। 2. लाल बहाद...

India and China Relations

The relationship between India and China , two of Asia’s largest and most influential nations, has long been shaped by a mix of strategic competition, economic interdependence , and border tensions . Below is an analytical breakdown of the key contentious issues between the two countries and suggestions for resolution aimed at enhancing cooperation. 🧱 Key Contentious Issues between India and China 1. Border Disputes Line of Actual Control (LAC) remains undefined, leading to frequent standoffs. Key flashpoints: Aksai Chin (claimed by India, controlled by China) and Arunachal Pradesh (claimed by China). Notable incidents: 1962 War Doklam Standoff (2017) Galwan Valley clash (2020) – resulted in deaths on both sides. 2. Strategic Rivalry in South Asia China’s growing influence in Pakistan, Nepal, Sri Lanka, and Maldives threatens India's regional clout. The China-Pakistan Economic Corridor (CPEC) passes through Pakistan-occupied Kashmir , which India strongly ...

French and Portuguese Territories

🇮🇳 उपनिवेशों का भारत में एकीकरण: कूटनीति, कानून और सैन्य नीति का संतुलन सम्पादकीय :UPSC GS Mains दृष्टिकोण “भौगोलिक एकता केवल सीमाओं का विस्तार नहीं, बल्कि संप्रभुता और आत्मनिर्णय का स्पष्ट घोषणापत्र होती है।” दो रणनीतियों की कथा 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी चुनौतियाँ थीं, उनमें से एक थी — विदेशी उपनिवेशों का शांतिपूर्ण और सम्मानजनक विलय । जहाँ एक ओर फ्रांस ने समझदारी और संवाद का मार्ग अपनाया, वहीं पुर्तगाल ने अपने उपनिवेशवादी भ्रम को त्यागने से इनकार किया। नतीजतन, भारत को दोनों स्थितियों में भिन्न रणनीतियाँ अपनानी पड़ीं — एक ओर राजनयिक सहमति , तो दूसरी ओर सैन्य हस्तक्षेप । फ्रांसीसी दृष्टिकोण: सहमति और संधि भारत में फ्रांसीसी उपनिवेश — पांडिचेरी, कराइकल, माहे, यानम और चंद्रनगर — भारत में शांतिपूर्ण ढंग से विलय हुए। 1948 में भारत-फ्रांस के बीच हुए समझौते के अनुसार, इन क्षेत्रों का भविष्य स्थानीय जनता की इच्छा पर निर्भर होगा। चंद्रनगर ने 1949 में जनमत संग्रह द्वारा भारत में विलय का निर्णय लिया। 1954 में पांडिचेरी व अन्य क्षेत्...

India's Suspension of the Indus Waters Treaty: Strategic, Ethical and Diplomatic Implications

भारत का सिंधु जल संधि स्थगन निर्णय: रणनीतिक, नैतिक और कूटनीतिक विश्लेषण | Gynamic GK भारत का सिंधु जल संधि स्थगन निर्णय: रणनीतिक, नैतिक और कूटनीतिक विश्लेषण प्रकाशित तिथि: 24 अप्रैल 2025 | लेखक: Gynamic GK Team भूमिका 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। इसके जवाब में भारत सरकार ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty - IWT) को अस्थायी रूप से स्थगित करने का निर्णय लिया। यह केवल कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक नीति, नैतिक विवेक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत की बदली प्राथमिकताओं का प्रतीक है। "पानी जीवन का आधार है, परंतु कूटनीति में यह शांति और युद्ध दोनों का हथियार बन सकता है।" 1. सिंधु जल संधि: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि संधि पर हस्ताक्षर: 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पा...

Cold War and Non-Aligned Movement: A Detailed Study

12th Political Science : Essential for Background. Cold War and Non-Aligned Movement: A Detailed Study. ✍️ By ARVIND SINGH PK REWA शीत युद्ध का अर्थ और परिभाषा शीत युद्ध (Cold War) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) के बीच उत्पन्न वैचारिक, कूटनीतिक और सामरिक संघर्ष को कहते हैं। यह प्रत्यक्ष युद्ध नहीं था, बल्कि मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, आर्थिक और प्रचार युद्ध था। दोनों महाशक्तियों के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा, गुप्तचरी, हथियारों की होड़ और प्रचार अभियान इसके मुख्य पहलू थे। ✅ प्रथम प्रयोग: "शीत युद्ध" शब्द का सर्वप्रथम उपयोग अमेरिकी राजनीतिज्ञ बर्नार्ड बैरूच ने 16 अप्रैल 1947 को किया था, लेकिन इसे लोकप्रियता पत्रकार वॉल्टर लिपमैन की पुस्तक The Cold War (1947) से मिली। 📚 शीत युद्ध की परिभाषाएँ डॉ. एम.एस. राजन: "शीत युद्ध सत्ता संघर्ष की राजनीति का मिश्रित परिणाम है। यह दो विरोधी विचारधाराओं और जीवन पद्धतियों के संघर्ष का परिणाम है।" डी.एफ. फ्लेमिंग: "शीत युद्ध वह युद्ध है, जो युद्धभूमि पर नहीं, बल्कि लोगों के मन-मस्तिष्क में लड़ा ज...

End of Bipolarity 12th Political Science Notes

 सोवियत संघ का विघटन और इसके वैश्विक प्रभाव सोवियत संघ (USSR) का विघटन 1991 में हुआ, जिसने द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Bipolar World Order) के अंत की शुरुआत की। यह घटना न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था, कूटनीति और शक्ति संतुलन को भी गहराई से प्रभावित किया। सोवियत संघ का पतन केवल एक देश का विघटन नहीं था, बल्कि यह समाजवादी व्यवस्था के पतन और पूंजीवादी व्यवस्था की विजय के रूप में देखा गया। इस निबंध में, हम सोवियत संघ के विघटन के कारणों, इसके प्रभावों और भारत सहित विश्व राजनीति पर इसके प्रभाव का विश्लेषण करेंगे। सोवियत संघ का गठन और विशेषताएँ सोवियत संघ की स्थापना सोवियत संघ (Union of Soviet Socialist Republics - USSR) की स्थापना 1922 में हुई थी। यह 15 गणराज्यों (Republics) का एक संघ था, जिसमें रूस, यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान आदि शामिल थे। यह समाजवादी (Socialist) विचारधारा पर आधारित था, जिसका उद्देश्य समानता और राज्य के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था स्थापित करना था। सोवियत संघ की विशेषताएं 1. राज्य...

Recent Development In Indian Politics : Class 12th Notes in hindi

 भारतीय राजनीति में हालिया परिवर्तन भारत की राजनीति ने 1980 के दशक के अंत से लेकर अब तक कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं। इस दौरान एक-दलीय वर्चस्व (Single-Party Dominance) की समाप्ति, गठबंधन सरकारों (Coalition Governments) का उदय, आर्थिक उदारीकरण (Economic Liberalization), जाति आधारित राजनीति (Caste-Based Politics), और धार्मिक मुद्दों (Religious Issues) का राजनीति पर प्रभाव प्रमुख रहे। इस लेख में 1989 से लेकर वर्तमान तक की राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण किया गया है, जिससे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़े प्रभाव को समझा जा सके। 1. 1990 का दशक: भारतीय राजनीति का एक नया मोड़ 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में भारतीय राजनीति में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। कांग्रेस के वर्चस्व का पतन, मंडल आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन, नई आर्थिक नीति, राम जन्मभूमि आंदोलन, और गठबंधन सरकारों का दौर इसी समय शुरू हुआ। 1.1 कांग्रेस का पतन और बहुदलीय राजनीति की शुरुआत 1947 से 1989 तक भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी का दबदबा था। लेकिन 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 197 सीटों पर सिमट जा...

12th Political Science Notes Chapter-6 : The Crisis Of Democratic Order

  आपातकाल (1975-77) – भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट यह नोट्स 12वीं कक्षा के राजनीति विज्ञान के "लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट" अध्याय का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें 1975-77 के आपातकाल की पृष्ठभूमि, कारण, प्रभाव और इसके परिणामों को विस्तार से समझाया गया है। मुख्य बिंदु: राजनीतिक परिप्रेक्ष्य (1971-75): इंदिरा गांधी की सरकार को बढ़ते असंतोष और विपक्षी आंदोलनों का सामना करना पड़ा। आर्थिक संकट: बांग्लादेश युद्ध, 1973 का तेल संकट, महंगाई और बेरोजगारी। न्यायिक फैसले और विरोध: इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय और जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन। आपातकाल की घोषणा: अनुच्छेद 352 के तहत मौलिक अधिकारों का निलंबन, प्रेस सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी। संवैधानिक परिवर्तन: 42वां और 44वां संविधान संशोधन, आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुधार। राजनीतिक परिणाम: 1977 का आम चुनाव, जनता पार्टी की जीत और कांग्रेस की ऐतिहासिक हार। यह विषय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने भविष्य में संवैधानिक सुरक्षा उपायों को मजबूत किया। आपातकाल की पृष्ठभूम...

12th राजनीति विज्ञान : पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधन

  यह अध्याय वैश्विक राजनीति में पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी मुद्दों के बढ़ते महत्व की जांच करता है। इसमें 1960 के दशक से बढ़ते पर्यावरणवाद की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण पर्यावरणीय आंदोलनों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसके साथ ही, साझा संसाधनों (common property resources) और वैश्विक कॉमन्स (global commons) की अवधारणाओं पर चर्चा की गई है। भारत के पर्यावरणीय बहसों में लिए गए हालिया रुख और संसाधन प्रतिस्पर्धा की भू-राजनीति पर भी प्रकाश डाला गया है। इस अध्याय का समापन समकालीन वैश्विक राजनीति में हाशिए पर पड़े स्वदेशी समुदायों की चिंताओं पर ध्यान देने के साथ किया गया है। 1. पर्यावरणीय मुद्दे और वैश्विक राजनीति पारंपरिक रूप से, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति युद्ध, संधियों, राज्य शक्ति के उत्थान-पतन और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की भूमिका तक सीमित रही है। लेकिन समय के साथ पर्यावरण और संसाधन-संबंधी विषय भी वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए हैं। इसके प्रमुख कारण हैं: 1. वैश्विक संसाधनों की कमी – खेती योग्य भूमि में वृद्धि रुक गई है, चरागाहों और मत्स्य संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो चुका है, ...

Advertisement

POPULAR POSTS